ITR (Income Tax Return) और TDS (Tax Deducted at Source)

ITR (Income Tax Return) और TDS (Tax Deducted at Source)

ITR (Income Tax Return) और TDS (Tax Deducted at Source) दोनों ही इनकम टैक्स से जुड़े टर्म हैं, लेकिन इन दोनों का काम और उद्देश्य अलग-अलग होता है।

ITR और TDS में अंतर (Difference between ITR and TDS):

विषय / बिंदुTDS (Tax Deducted at Source)ITR (Income Tax Return)
🔍 मतलबस्रोत पर ही टैक्स काट लिया जानाआपकी पूरी साल भर की इनकम का ब्यौरा सरकार को देना
👤 कौन करता हैपेमेंट देने वाला व्यक्ति / संस्था (जैसे बैंक, कंपनी)इनकम कमाने वाला व्यक्ति (आप, मैं, व्यापारी, प्रोफेशनल आदि)
💰 कब होता हैजब कोई पेमेंट की जाती है (सैलरी, ब्याज, रेंट आदि)वित्त वर्ष खत्म होने के बाद (आमतौर पर अप्रैल–जुलाई में)
🎯 उद्देश्यसरकार को पहले से टैक्स मिल जाएयह दिखाना कि आपने कितना कमाया और कितना टैक्स देना है / दिया है
📄 फॉर्मTDS return – Form 24Q, 26Q, 27QITR – ITR-1, ITR-2, ITR-3, ITR-4 आदि
📆 फाइलिंग की टाइमिंगहर तिमाही (quarterly)साल में एक बार (फाइनेंशियल ईयर के बाद)
💸 रिफंड से संबंधTDS कटता है तो रिफंड तभी मिलेगा जब ITR फाइल करेंगेITR फाइल करने से रिफंड क्लेम कर सकते हैं
⚠️ लेटलतीफी पर असरTDS न फाइल करने पर पेनल्टी कंपनी/संस्था को लगती हैITR लेट फाइल करने पर व्यक्ति को लेट फीस और ब्याज देना पड़ता है

सरल शब्दों में समझें:

  • TDS: जब आपको पेमेंट मिलती है (जैसे सैलरी, ब्याज), तो देने वाला पहले ही टैक्स काट लेता है – इसे TDS कहते हैं।
  • ITR: साल खत्म होने के बाद आप सरकार को बताते हैं कि आपने कुल कितना कमाया और कितना टैक्स बनता है – इसे ITR फाइल करना कहते हैं।

अगर आपके ऊपर TDS कटा है, तो आप ITR फाइल करके रिफंड भी पा सकते हैं (अगर ज़्यादा कट गया हो)।

उदाहरण:

मान लीजिए आपने एक साल में ₹4 लाख FD ब्याज कमाया और बैंक ने उस पर ₹40,000 TDS काट लिया।
लेकिन आपकी कुल इनकम ₹2.5 लाख है, जो टैक्स के दायरे में नहीं आती।

➡️ ऐसे में:

  • TDS तो कट गया ✅
  • लेकिन रिफंड लेने के लिए आपको ITR फाइल करना पड़ेगा

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